कांट्रैक्ट कर्मचारियों ने चंडीगढ़ प्रशासन और राजनीतिक दलों के खिलाफ निकाला गुबार

प्रशासन की निर्णय लेने की अक्षमता व राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से सैकड़ों कांट्रैक्ट कर्मचारी छंटनी की कगार पर: शिवमूरत

CHANDIGARH, 21 MARCH: चंडीगढ़ प्रशासन की कर्मचारी विरोधी नीतियों के चलते चंडीगढ़ के सैंकड़ों कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी नौकरी से बेजार होने जा रहे हैं, जिसमें राजनीतिक पार्टियां और इनके दिग्गज नेता भी बराबर के भागीदार हैं। इनकी नीतियों के चलते कर्मचारी वर्ग सदैव पिसता आया है लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव में कर्मचारी वर्ग इन नेताओं को अपनी अहमियत से अवगत करवाएगा। यह कहना है ऑल कांटरेक्चुअल कर्मचारी संघ भारत के प्रधान अशोक कुमार, महासचिव शिवमूरत, चेयरमैन बिपिन शेर सिंह का।

लोकसभा सभा चुनाव से पहले आज एक प्रेस कांफ्रेंस में कांट्रैक्ट, डीसी रेट, एन.एच.एम. व आउटसोर्सिंग वर्कर्स के इन नेताओं ने शासन व प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अपनी मांगों के प्रति लगातार संघर्ष करने का ऐलान किया। उन्होंने बताया कि यूटी चंडीगढ़ में संवैधानिक विसंगति के चलते वर्ष 1992 से कर्मचारियों पर पंजाब सेवा नियम लागू थे। चंडीगढ़ प्रशासन ने केंद्रीय दिशा-निर्देशों अनुसार रिक्रूटमेंट रूलों के अभाव में पंजाब सेवा नियमों अनुसार सैंक्शन व अन्य पोस्टों पर हजारों की तादाद में कांट्रैक्ट, डीसी रेट व आऊटसोर्सिंग कर्मचारियों के रूप में तकरीबन 20000 भर्तियां की लेकिन चंडीगढ़ प्रशासन ने कांट्रैक्ट कर्मचारियों को नियमित करने में कभी कोई पहल नहीं की, हालांकि डेली वेज कर्मचारियों के लिए वर्ष 2014-15 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय अनुसार दस साल की सेवा को नियमित किया गया परन्तु कांट्रैक्ट कर्मचारियों पर न तो पंजाब की पालिसी अपनाई गई और न ही सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार केंद्रीय दिशा-निर्देशों की पालना की गई।

संघ के नेताओं ने बताया कि प्रशासन की निर्णय लेने की अक्षमता व संवैधानिक विसंगति के चलते अफसरशाही अपनी मनमानी से पंजाब और केंद्रीय रूलों में पिक एंड चूज करती रही और कर्मचारी अपने लाभों के लिए कोर्ट की शरण लेते रहे। वर्ष 2022 में तीस वर्ष बाद संवैधानिक विसंगति को दूर करने के लिए चंडीगढ़ में केंद्रीय सेवा नियम लागू किए गए और केंद्रीय दिशा- निर्देशों अनुसार चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा सैंक्शन पोस्टों पर कार्यरत कांट्रैक्ट कर्मचारियों के पदों को खाली मानकर उन्हें नौकरी से बाहर निकालने की कवायद तेज कर दी गई है। प्रशासन द्वारा तीस वर्ष बाद केंद्रीय दिशा- निर्देशों अनुसार युद्ध स्तर पर रिक्रूटमेंट रूल पारित कर व खत्म पदों को पुनर्जीवित कर रैगुलर भर्तियों की तैयारी की जा चुकी है, जिसकी वजह से बिना किसी कसूर के कांट्रैक्ट कर्मचारियों पर छंटनी की तलवार लटका दी गई है।

उन्होंने कहा कि दूसरी तरफ वर्षों से ही राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से कांट्रैक्ट कर्मचारियों के मुद्दे लगभग 25 वर्षों से सिर्फ संकल्प पत्रों व मैनिफेस्टो की सिर्फ शोभा बढ़ाने तक ही सीमित हैं। हर बार चुनाव आने पर इन राजनीतिक पार्टियों के लीडर कर्मचारियों से वायदे कर जाते हैं कि सत्ता में आने पर वो निश्चित तौर पर कर्मचारियों की सभी उचित मांगों को लागू करवाएंगे, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद यह नेता सत्ता में आते ही अपने वायदों से मुकर जाते हैं और कर्मचारियों की मांगों को अनसुना और अनदेखा करना शुरू कर देते हैं लेकिन इस बार कर्मचारियों ने ठान लिया है कि वो इन राजनीतिक पार्टियों और इनके नेताओं को अपनी ताकत दिखा देंगे और वोट का बहुत ही समझदारी से उपयोग करेंगे।

उन्होंने कहा कि प्रशासन द्वारा रिक्रूटमेंट रूल न बनाने व रैगुलर भर्तियां न करने व सुरक्षित पालिसी न बनाने से लगभग 1500 कांट्रैक्ट कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय है। अफसरशाही राजनीति पर भारी है और कांट्रैक्ट कर्मचारी चंडीगढ़ प्रशासन की दया पर रैगुलर भर्तियों तक ही टिके हैं। लोकसभा चुनाव के चलते सैकड़ों कर्मचारियों को इन राजनेताओं से भी कोई उम्मीद नहीं है।

उन्होंने कहा कि ऑल कांटरेक्चुअल कर्मचारी संघ भारत से जुड़े डीसी रेट कर्मचारी समान कार्य समान वेतन की मांग लगातार करते आ रहे हैं परन्तु प्रशासन की अनदेखी से इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। लगभग 15000 आऊटसोर्सिंग वर्कर्स के लिए सुरक्षित पालिसी के रूप में हरियाणा प्रदेश की तर्ज पर कौशल विकास व रोजगार निगम अनुसार नौकरी की सुरक्षा की मांग भी प्रशासन द्वारा दरकिनार की जा रही है।

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