रिटायर्ड प्रिंसीपल डॉ. कर्मचंद की पुस्तक ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का विमोचन

मानवीय सरोकार एवं समभाव का संदेश देती है ‘वसुधैव कुटुंबकम’

CHANDIGARH, 12 DECEMBER: अभिव्यक्ति, सृष्टि प्रकाशन और सैंट्रल स्टेट लाइब्रेरी चंडीगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. निर्मल सूद ने आज लाइब्रेरी के सभागार में रिटायर्ड प्रिंसीपल डॉ. कर्मचंद द्वारा लिखित ‘वसुधैव कुटुंबकम’ पुस्तक का विमोचन किया। मूलतः हमीरपुर निवासी डॉ. कर्मचंद सोलन जिले में स्थित सीनियर सेकेंडरी स्कूल घरेड से रिटायर हुए हैं और लेखन कार्य में उनकी गहन रुचि है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ पुस्तक लिखने का उनका उद्देश्य मात्र वर्तमान में युद्ध, बेरोजगारी, भुखमरी, पर्यावरण संकट और सांस्कृतिक विघटन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे विश्वभर के लोगों के दिलो-दिमाग में आपसी सदभाव एवं समरसता की भावना पैदा कर उन्हें वसुधैव कुटुंबकम की नीति को आधार मानकर एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य के रूप में दिखाना है।

क्योंकि इस भाव से ही उनमें हथियारों की होड़ के स्थान पर संवाद और सहयोग का मार्ग प्रशस्त होगा और उनमें सह अस्तित्व संभव हो पाएगा, जो मानवीय मूल्यों, सामाजिक संरचना के प्रगतिशील दृष्टिकोण द्वारा विश्व बंधुता की भावना के साथ-साथ समसामयिक विषयों जैसे पारिवारिक संरचना, पर्यावरण चेतना युवा पीढ़ी की भागीदारी और भारत के वैश्विक योगदान के प्रयासों को भी दर्शाती है। पुस्तक में मानवता की खुशहाली को प्रमुखता देते हुए संदेश दिया गया है कि स्वार्थी और लालची स्वभाव को नियंत्रित कर जियो और जीने दो, एवं सर्वे जन: सुखिन: भवंतु तथा वसुधैव कुटुंबकम को आधार मानकर धर्म, जाति और क्षेत्रवाद के भेदभाव भुलाकर, संहारक अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण बंद कर, मानवता की सुख समृद्धि के लिए प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में पेड़- पौधे लगाकर प्रकृति के संरक्षण के लिए दिल से प्रयास करने होंगे, यदि दुनिया के सभी मानव आने वाली युवा पीढ़ियों को सुखी और आरोग्य जीवन व्यतीत करने का सौभाग्य प्रदान करने में दिल से प्रयास करें तो हमारे लिए यह सभ्य मानवता का उत्तम उदाहरण होगा।

वास्तव में वसुधैव कुटुंबकम की नीति प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति की आत्मा रही है और हमेशा रहेगी। समाज में परस्पर सहयोगात्मक, आत्मीयता एवं विश्व बंधुता आदि नीतियों पर बल देकर आपसी सामंजस्य से यदि विश्व के हर मनुष्य का प्रयास नर सेवा ही नारायण सेवा के प्रति आहूति डालने के सदृश्य हो एवं वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श का पालन करना हो तो धरती पर ही स्वर्ग की अनुभूति हो सकती है।

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