संस्कार भारती चंडीगढ़ और बृहस्पति कला केंद्र ने प्राचीन कला केंद्र में आयोजित की काव्य गोष्ठी ‘साहित्य सरिता’
CHANDIGARH, 6 JULY: प्राचीन कला केंद्र सेक्टर-35 चंडीगढ़ में आज संस्कार भारती चंडीगढ़ और बृहस्पति कला केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में मासिक कवि गोष्ठी ‘साहित्य सरिता’ का आयोजन किया गया। संस्कार भारती के मार्गदर्शक प्रोफेसर सौभाग्य वर्धन ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात कवियत्री डॉ. प्रज्ञा शारदा ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ चर्चित कवि डा. अनीश गर्ग ने अपने शेर के साथ किया-
बरस रहे हैं काले बादल मेरे शहर में।
रात सी लगे है भरी दोपहर में।।
नवोदित कवियत्री कामनी ने अपनी रचना में कहा-
ने वो मेरी मां, मैं उसकी जाई हूं,
उसी की बदौलत इस दुनिया में आई हूं।
सुधा मेहता ने कहा-
ढाई अक्षर प्रेम के, प्रेम का रंग है लाल,
राधा संग जब खेले होली, बन जाता है गुलाल।
मंजू खोसला ने अपनी कविता में कहा-
मंगल से बड़ी न शुभता न वरदान,
मंगल का चढ़ा है साल।
नारायण डोगरा ने रचना पढ़ी-
उम्र से शरीर की तकरार हो गई,
बात कुछ ऐसी थी कि बर्दाश्त के बाहर हो गई।
नीरज रायजादा ‘नायाब’ ने अपनी कविता में पिता के अनुभव को व्यक्त करते हुए कहा-
पिता बनकर ही जाना, होना पिता होता है क्या,
बच्चे हों जब दूर घर से कोई पिता सोता है क्या।
अनीता नरवाल की ये रचना सराही गई-
लोग बिछड़े मिला नहीं करते,
टूट कर दिल जुड़ा नहीं करते।
विकास सैनी ने बेटे के पढ़ाई के लिए बाहर जाने पर लिखी पंक्तियां भी खूब पसंद की गईं-
खाली नहीं है उसका कमरा,
है उसकी यादें बसी हुई।
दर्शना सुभाष पाहवा ने अपना गीत सुनाया-
मोहे श्याम कहें सजनी सजनी,
मैं तो इत उत डोलूं पगली सी।
डा. अनीश गर्ग ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कविता पढ़ी-
रंजिशों को कुछ यूं वो तमाम करता है,
दुश्मनों को भी झुककर सलाम करता है।
डा. प्रज्ञा शारदा ने अध्यक्षीय संबोधन के बाद अपनी कविता पढ़ी-
दवा बहुत हो चुकी अब छोड़ो डाक्टर रोग को,
अब मेरी मां ही करेगी इलाज मेरा।
इस कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार निर्मल सूद, युवा कवि प्रदीप, श्याम चंद्र मिश्र, अनु रानी शर्मा, कुसुम धीमान कलिका, राजन सुदामा, कंवलजीत कंवल की भी प्रस्तुतियों को सराहना मिली। अंत में संस्कार भारती के अध्यक्ष यशपाल कुमार एवं मंत्री मनोज सिंह ने सभी का धन्यवाद व्यक्त किया।

