आज की कविताः कहानी किसान की

रात के पिछले पहर में
हल की हत्थी
हाथ में पकड़ कर
खेतों की पगडंडी पर
कदम बढ़ाता चला जा रहा है
बादल जिसके मीत हैं
खेत जीत के गीत हैं
खुद भूखा रहकर वो
जहां का पेट भरता है
वर्षा, धूप, आंधी, सर्दी
कोहरा भरी कड़कती ठंडी रात में
दुनिया को सुख पहुंचाने को
मेहनत से नहीं डरता है
उसका नाम किसान है।

जिसका नाम किसान है
आज वही परेशान है
सरकार वादे कर रही है
तारीख पर तारीख बढ़ रही है
दांव पे लगी आन है
खतरे में उसकी जान है
पूरा मूल्य मिले मेहनत का
बस इतना ही अरमान है।

इतना सा अरमान है
ये खेत ही उसकी जान है
घर परिवार तो अब छोड़ दिया
सर्दी में खुद को घोंप दिया
पहले मरता था कर्ज में डूब
अब बलि चढ़ा सत्ता की भूख
मजबूरी में बेबस वो
फांसी को गले लगाता है
इसीलिए किसान का वंश
किसान नहीं बन पाता है।

लहलहाती फसलें व खेत
एक स्वप्न सा हो गए हैं
किसान तो स्वयं ही
दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं।

न जाने ये खेल विधाता
कैसा रचता जाता है
पेट भरे जो सब लोगों का
मिट्टी में मिट्टी हो जाता है
वो अन्नदाता है आज सड़क पर
नेता आंख दिखाता है।

यहां किसी का कोई नहीं
सब के सब हरजाई हैं
मरते हुए अन्नदाता की
कहानी बड़ी दुखदायी है।

  • डॉ. प्रज्ञा शारदा, चंडीगढ़। 9815001468
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